चंदा संस्कृति की व्यथा कथा

संस्कारधानी में एक नई बीमारी ने जन्म ले लिया है वह है चन्दा वसूलना ।  पूरे साल का पंचांग देख कर त्यौहार निकाले जाते हैं जिनके नाम पर वसूली की जा सके और कोई त्यौहार नहीं हो तो कुछ और कार्यक्रम बना लिया जाता है ।
किसका त्यौहार है क्यों और कैसे मना रहे हैं यह भी नहीं पता मगर उनके नाम पर चन्दा नहीं देंगे तो आप नास्तिक माने जायेंगे और नास्तिक होना पाप है चन्दा लेना पुण्य है । किसके घर की क्या स्थिति है कोई दुःख है इससे कोई मतलब नहीं ।
नहीं देंगे तो पहले आपको ताने मारे जायेंगे उससे भी काम नहीं बना तो अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया जाएगा और फिर भी आपकी आस्था नहीं डिगी तो हंगामा करके डराया जाएगा । यदि आपने फिर भी जेब ढीली नहीं की तो कम से कम आपका मन और विश्वास तो खराब कर ही दिया ।
उस पर ये मत पूछना चंदे के धन का कैसे इस्तेमाल होगा ।  उपवास रखने के त्यौहार पर भंडारा होयेगा, मन की शान्ति के लिए लाऊड स्पीकर बजाया जाएगा और निषेध के त्यौहार में सुरा पान किया जाए मगर चन्दा तो देना पडेगा।
शहर के बहुत से युवा अलग अलग शहरो में जाकर मेहनत कर रहे है ज़िन्दगी बना रहे है और शहर का नाम रोशन कर रहे हैं, जो नहीं गए हैं वो भी कुछ करने की लगन में लगे है। मगर कुछ युवा संस्कारधानी में रह कर भी संस्कारहीन हो गए हैं। ये कर्म करना तो दूर व्यवहार भी भूल गए है और सबसे बुरी बात कि गलत को गलत ही नहीं मानते, क़ानून तो छोडिये सभ्य व्यवहार क्या होता है नहीं पता, ना मानते है मगर आपने चन्दा नहीं दिया तो आप ज़रूर गुनाहगार हैं।
एक तरफ देश चाँद पर कदम रखने की तैयारी कर रहा है और ये जाहिल चन्दा मामा की कहानी सुनाकर चन्दा वसूल रहे है।
यह अत्यंत ही चिंता का विषय है और शहर के गणमान्य नागरिको और प्रशासन को बिना किसी संरक्षण के इन्हें कठोरता से संयमित करने हेतु उचित कदम उठाना ज़रूरी है। Mentioning problem is not enough, click here to know what can be done.